हनुमान जयंती की कहानी (Hanuman Jayanti ki kahani)

हनुमान जयंती की कहानी (Hanuman Jayanti ki kahani)



। प्रत्येक मास की पूर्णिमा तिथि पवित्र मानी गई है। इस
दिन देव-नदी सरोवर आदि में स्नान, दान करने से एक मास
तक स्नान का फल प्राप्त होता है। हिन्दुओं के घरों में स्त्रियां
भगवान लक्ष्मी नारायण को प्रसन्न करने के लिए यह व्रत
धारण करती हैं और सत्यनारायण प्रभु की कथा सुनी जाती है।
चैत्र की पूर्णिमा चैत्र पूजन भी कही जाती है इस दिन
भगवान योगेश्वर श्रीकृष्ण ने ब्रज में रास क्रीड़ा उत्सव का
अन्तिम विशाल आयोजन किया था, जिसे महारास के नाम से
पुकारा जाता है। छः माह की पूर्णिमा में कार्तिक पूर्णिमा से
समारम्भ कर चैत्र की पूर्णिमा को रास उत्सव की समाप्ति हुई
थी। इस दिन श्री कृष्ण ने अपनी अनन्त योग शक्ति से अपने
असंख्य रूप धारण कर जितनी गोपी उतने ही कान्हा का
विराट वैभव विस्तार कर विषय लोलुपता के देवता कामदेव
को योग पराक्रम से आत्माराम और पूर्ण काम स्थिति प्रगट
करके विजय किया था। श्रीकृष्ण के योगनिष्ठ बल की यह
सबसे कठिन परीक्षा थी जिसे उन्होंने अनासक्त भाव से निस्पृह
रहकर योगरूढ़ पद से विजय से रास पंचाध्यायी के श्री कृष्ण
के रास प्रसंग को तात्विक दृष्टि से श्रवण और मनन करना
चाहिए।
कुछ दक्षिणी लोगों का मत है कि इस पूर्णिमा को हनुमान
जी का जन्म हुआ था, अतः वे लोग इसे हनुमान जन्म दिवस के
रूप में भी मनाते हैं। यों वायु पुराण दिनों के अनुसार कार्तिकके रास प्रसंग को तात्विक दृष्टि से श्रवण और मनन करना
चाहिएँ। प्रत्येक मास की पूर्णिमा तिथि पवित्र मानी गई है। इस
दिन देव-नदी सरोवर आदि में स्नान, दान करने से एक मास
तक स्नान का फल प्राप्त होता है। हिन्दुओं के घरों में स्त्रियां
भगवान लक्ष्मी नारायण को प्रसन्न करने के लिए यह व्रत
धारण करती हैं और सत्यनारायण प्रभु की कथा सुनी जाती है।
चैत्र की पूर्णिमा चैत्र पूजन भी कही जाती है इस दिन
भगवान योगेश्वर श्रीकृष्ण ने ब्रज में रास क्रीड़ा उत्सव का
अन्तिम विशाल आयोजन किया था, जिसे महारास के नाम से
पुकारा जाता है। छः माह की पूर्णिमा में कार्तिक पूर्णिमा से
समारम्भ कर चैत्र की पूर्णिमा को रास उत्सव की समाप्ति हुई
थी। इस दिन श्री कृष्ण ने अपनी अनन्त योग शक्ति से अपने
असंख्य रूप धारण कर जितनी गोपी उतने ही कान्हा का
विराट वैभव विस्तार कर विषय लोलुपता के देवता कामदेव
को योग पराक्रम से आत्माराम और पूर्ण काम स्थिति प्रगट
करके विजय किया था। श्रीकृष्ण के योगनिष्ठ बल की यह
सबसे कठिन परीक्षा थी जिसे उन्होंने अनासक्त भाव से निस्पृह
रहकर योगरूढ़ पद से विजय से रास पंचाध्यायी के श्री कृष्ण
के रास प्रसंग को तात्विक दृष्टि से श्रवण और मनन करना
चाहिए।
कुछ दक्षिणी लोगों का मत है कि इस पूर्णिमा को हनुमान
जी का जन्म हुआ था, अतः वे लोग इसे हनुमान जन्म दिवस के
रूप में भी मनाते हैं। यों वायु पुराण दिनों के अनुसार कार्तिकके रास प्रसंग को तात्विक दृष्टि से श्रवण और मनन करना
चाहिए।

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