नाग पंचमी कथा (nag panchami katha)

नाग पंचमी कथा (Nag panchmi katha) 



कथा :–प्राचीन दन्त कथाओं से ज्ञात होता है कि किसी
ब्राह्मण के सात पुत्रवधुयें थीं। सावन मास लगते ही छः बहुएं
तो भाई के साथ मायके चली गई परन्तु अभागी सातवीं के
कोई भाई ही न था कौन बुलाने आता बेचारी ने अति दुखित
होकर पृथ्वी को धारण करने वाले शेषनाग को भाई रूप में
याद किया। करुणायुक्त, दीन वाणी को सुनकर शेष जी बद्ध
ब्राह्मण के रूप में आये, और फिर उसे लिवाकर चल दिये।
थोड़ी दूर रास्ता तय करने पर उन्होंने अपना असली रूप
धारण कर लिया। तब फन पर बैठाकर नाग-लोक ले गये।
वहां वह निश्चिन्त होकर रहने लगी। पाताल लोक में जब वह
निवास कर रही थी, उसी समय शेष जी की कुल परम्परा में
नागों के बहुत से बच्चों ने जन्म लिया। उस नाग बच्चों को
का एक दीपक दिया तथा बताया कि इसके प्रकाश से तम
सर्वत्र विचरण करते देख शेष-नागरानी ने उस वधू को पीतल
अंधेरे में भी सब कुछ देख सकोगी। एक दिन अकस्मात उसके
परिणाम स्वरूप उन सब की थोडी पंछ कट गई।
हाथ से दीपक नीचे टहलते हुए नाग बच्चों पर गिर गया।
यह घटना घटित होते ही कुछ समय बाद वह ससुराल
भेज दी गई। जब अगला सावन आया तो वह बधू दीवाल पर
नाग देवता को उरेह कर इसकी विधिवत पूजा तथा मंगल
कामना करने लगी। इधर क्रोधित नाग बालक माताओं से
अपनी पूंछ काटने का आदि कारण इस वधू को मारकर बदला
चुकाने के लिये आये थे, लेकिन अपनी ही पूजा में श्रद्धा-वनत
उसे देखकर वे सब प्रसन्न हुए और उनका क्रोध समाप्त हो
गया। बहन स्वरूपा उस वधू के हाथ से प्रसाद रूप में उन लोगों
ने दूध तथा चावल भी खाया। नागों ने उसे सर्प कुल से निर्भय
होने का वरदान तथा उपहार में मणियों की माला दी। उन्होंने
यह भी बताया कि श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को हमें
भाई रूप में जो पूजेगा उसकी हम रक्षा करते रहेंगे।

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