श्री कृष्ण जन्माष्टमी की कथा और आरती (Shri Krishna Janmashtami ki katha and aarti)

श्री कृष्ण जन्माष्टमी की कथा और आरती  (Shri Krishna Janmashtami ki katha and aarti)



आरती:-आरती श्री कृष्ण जी की कीजै ।। टेक........
शकटासुर को जिसने मारा। तृणावर्त को आय पछाड़ा।।
उनके गुण का वर्णन कीजै ।। आरती..
यमुनार्जुन वट जिसने तेरे । बकासुरादि असुर जिन मारे।।
उनकी कीर्ति वर्णन कीजै ।। आरती..
जिसने धेनुक प्रान निकारे । कालिया नाग नाथ के डारे।।
उसी नाथ का कीर्तन कीजै ।। आरती..
व्योमासुर को स्वैग पटाया। कुब्जा को जिसने अपनाया।।
दयावान के सुपर हूजै ।। आरती.
वृषभासुर को जिसने मारे । चारुणदिक सभी पछारे ।।
आरती यदुनन्दन की कीजै ।। आरती..
जिसने किसी केश उखारे । कंसासुर के प्रान निकारे ।
आरती कंस हनन की कीजै ।। आरती.
जिसने द्रोपदि लाज बचाई । नरसी जी का भात चढाई
आरती भक्त वत्सल की कीजै ।। आरती.
भक्तन के जो हैं रखवारे । 'रनवीरा' मन बसने बारे ।
उनहां पर बलिहारी हूजै ।। आरती.....।


कथा :-भाद्रपद कृष्ण अष्टमी को जन्माष्टमी' उत्सव मनाया जाता
है। इसी तिथि को श्री कृष्ण का मथुरा नगरी में कंस के कारागार
में जन्म हुआ था। इस दिन कृष्ण जन्मोत्सव के उपलक्ष में
मंदिरों में जगह-जगह कीर्तन तथा झांकियां सजाई जाती है।
बारह बजे रात्रि तक व्रत रहकर भगवान का प्रसाद लिया
जाता है। दूसरे दिन प्रातः ही इसी उपलक्ष में नन्द महोत्सव भी
मनाया जाता है। भगवान के ऊपर १ हल्दी, दही, घी, तेल
आदि डिक कर आनन्द से पालने में लाया जाता है। जन्माष्टमी
के दिन उपवास करने से मनुष्य सात जन्मों के पापों से छूट
जाता है। धर्म शास्त्रों में पलंग पर देवकी सहित श्री कृष्ण के
पूजन का विधान बताया गया है।


आरती:-आरती श्री कृष्ण जी की कीजै ।। टेक........
शकटासुर को जिसने मारा। तृणावर्त को आय पछाड़ा।।
उनके गुण का वर्णन कीजै ।। आरती..
यमुनार्जुन वट जिसने तेरे । बकासुरादि असुर जिन मारे।।
उनकी कीर्ति वर्णन कीजै ।। आरती..
जिसने धेनुक प्रान निकारे । कालिया नाग नाथ के डारे।।
उसी नाथ का कीर्तन कीजै ।। आरती..
व्योमासुर को स्वैग पटाया। कुब्जा को जिसने अपनाया।।
दयावान के सुपर हूजै ।। आरती.
वृषभासुर को जिसने मारे । चारुणदिक सभी पछारे ।।
आरती यदुनन्दन की कीजै ।। आरती..
जिसने किसी केश उखारे । कंसासुर के प्रान निकारे ।
आरती कंस हनन की कीजै ।। आरती.
जिसने द्रोपदि लाज बचाई । नरसी जी का भात चढाई
आरती भक्त वत्सल की कीजै ।। आरती.
भक्तन के जो हैं रखवारे । 'रनवीरा' मन बसने बारे ।
उनहां पर बलिहारी हूजै ।। आरती.....।

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